Sunday, July 24, 2011

पिज़ा डेलिवेरी

पता नहीं क्या हो गया है घर की घंटी को | दो दिन पहले अचानक काम करना बंद कर दिया और जब से कोई भी घर पर आता है, आते पहले दरवाज़े के मुक्के या थप्पड़ बरसाने लगता है | मुझे अपनी किताब लेके बस मुश्किल से दस मिनट ही हुए थे की तीसरे बार दरवाज़े पर आवाज़ होने लगी | मगर इस बार मैंने भी सोच लिया था कि होने दो, जो भी कोई होगा थोड़ी देर में परेशान होके चला जाएगा पर अब हम दरवाज़ा नहीं खोलेंगे | तीन चार बार आवाज़ हुई और फिर बंद हो गयी, मैंने दो मिनट तक इंतज़ार किया और कोई आवाज़ नहीं होने पर खुद को जीत की बधाई दी | मैंने चैन से फिर एक बार मुस्करा के अपनी आँखों में किताब के खुले पन्ने का स्वागत किया और मन लगा के दुबारा पढ़ने लगा, जैसे ही दूसरी लाइन ख़त्म होने को थी, दरवाज़े ने फिर मुझे आवाज़ लगा ही दी | अब मेरे पास उठ के दरवाज़ा खोलने के अलावा कोई चारा नहीं था, मैं गुस्से में बडबडाते हुए उठा और जाकर दरवाज़ा खोला |
बाहर एक लड़का एक बड़ा सा बैग कंधे पे लटकाए खड़ा था, उसके हाथ हाथ में कुछ टिशु पेपर्स और दो - तीन अलग अलग रंगों वाली डब्बीयां थीं |
मैंने पुछा "कौन हो भाई?"
लड़के ने मुस्कराते हुए बोला "पिज़ा डेलिवेरी सर"
"मगर हम ने कोई पिज़ा वीजा नहीं मंगवाया यार", मैंने गुस्से में बोला | सुन के लड़का थोडा सा सहम गया और अपने बैग में से कोई कागज़ निकल के पढ़ने लगा |
कुछ पढ़ने के बाद बोला "सर अड्रेस तो ये ही है ना?"
मैंने उसके हाथ से कागज़ लेके के देखा तो मैं भी चौंक गया ये देख के की पता तो मेरे ही घर का ही है | फ्लैट नंबर C-301 ही लिखा है और बिल्डिंग का नाम भी सही है, "यार अड्रेस तो ये ही है, मगर यहाँ से किसी ने कुछ भी आर्डर नहीं किया है, फिर भी मैं अन्दर देख के आता हूँ" मैंने उस से धीरे से कहा |
जहाँ तक मुझे पता था की मेरे अलावा घर में और कोई भी नहीं था, फिर भी मैंने सब कमरों में जाके देखा कि कोई आ गया हो और मुझे पता नहीं पड़ा हो, मगर अन्दर कोई भी नहीं था | मैंने वापस बाहर जाकर उस को बताया की कोई भी घर में नहीं है और यहाँ से किसी ने कुछ भी नहीं मंगवाया है | ये सुन के लड़के का मुह एकदम लटक गया, शायद उस का कारण तीस मिनट में पिज़ा डिलीवर करने वाला फंडा रहा होगा | उसने अपना सारा सामान वापस बैग में रखना शुरू कर दिया था | मुझे समझ में आ गया था कि जिसने भी फ़ोन पर आर्डर लिया था उस ने गलत पता लिख लिया था और अब किसी ना किसी को इस गलती से नुकसान ज़रूर होगा | मैंने उस से वापस वो कागज़ माँगा जिस पर पता लिखा था | कागज़ पर पते के नीचे एक मोबाइल नंबर भी लिखा था जो की हमारे घर में से किसी का भी नहीं था |
मैंने बोला "ये नंबर है ना, इस पर फ़ोन करो ना" |
"सर हमारे पास फ़ोन नहीं है" बैग के चेन बंद करते करते उसने बोला |
मैंने कुछ सोचा और बोला "रुको यहाँ पर, मैं फ़ोन करता हूँ" |
सुन के लड़के ने पहले तो थोडा आश्चर्य से मुझे देखा फिर मुस्कराने लगा | मैं अन्दर जा कर अपना फ़ोन लेके आया, कागज़ पर नंबर देख के फ़ोन लगाया और मन ही मन सोच रहा था की फ़ोन ज़रूर लग जाना चाहिए | जब फ़ोन पर गाना बजने लगा तो थोड़ी शांती आयी और फिर किसी ने दूसरी तरफ से हेलो बोला |
मैंने झट से पुछा "तुमने कोई पिज़ा आर्डर किया है?"
"येस" वहां से आवाज़ आये |
मैंने पुछा "तुम्हारा अड्रेस क्या है?"
उस ने बोला "C-201", और बिल्डिंग का नाम वो ही था जिस में हम खड़े थे |
मैंने मुस्करा के बोला "ओके", और फ़ोन काट दिया |
पिज़ा वाला लड़का मुझे बड़े गौर से देख रहा था, मैंने उस से बोला "मिल गया, इस के नीचे वाला फ्लैट है" |
लड़का एकदम खुश हो गया और बोला "थेंक यू सर, अड्रेस यहाँ का था इसलिए गलती से यहाँ आ गया था, थेंक यू अगेन सर" |
मैंने बोला "कोई बात नहीं, चलता है" और दरवाज़ा बंद कर दिया |
मैं भी थोडा खुश था मगर मुझे ये समझ में नहीं आ रहा था की मैं खुश क्यों हूँ?, मुझे उस लड़के की मदद कर के अच्छा लगा है या मुझे ये पता है कि कम से कम अब वो लड़का मुझे किताब पढने में परेशान नहीं करेगा |

Friday, March 11, 2011

बिस्कुट वाला बच्चा

अब मेरे पास जेब में केवल तीन रुपये बचे थे और जहाँ मैं खड़ा था वहां से घर की तरफ जाने वाली बस में कम से कम चार रुपये का टिकट आता था | आज पता नहीं कैसे हो गया कि घर से निकलते समय मैं अपने बटुए में पैसे रखना भूल गया | बस में बैठने के बाद याद तो आया था, मगर सोचा की कोई बात बात नहीं वापस बस से आने का किराया तो है ही |

शहर के टेलीफोन विभाग का मुख्य कार्यालय थोडा शहर के बाहर की तरफ था | वहां पर घर का टेलीफोन बदलवाने के लिए अर्जी देनी थी और पिताजी ने दफ्तर जाने के पहले बोला था कि ये काम आज के आज हो जाना चाहिए | सुबह से आलस करते करते आधा दिन निकल चूका था फिर आखिरकार माँ की डांट सुनने के बाद मुझे निकलना ही पड़ा था |

धुप काफी तेज थी और मैं सड़क के किनारे खड़ा था, सोच रहा था की बस में चढ़ तो जाता हूँ और कंडक्टर को बोलूँगा की जहाँ तक तीन रुपये में छोड़ सकता है छोड़ दे मगर कंडक्टर नहीं माना तो फ़ालतू में बेईज्ज़ती हो जाएगी और बस से उतार और देगा, उसके ऊपर से अगर बस में कोई मोहल्लेवाला होगा तो पूरे मोहल्ले में बात फ़ैल जायेगी, सारे दोस्त हँसेंगे | वहां से अब मेरे पास पैदल जाने के अलावा कोई और उपाय नहीं था, मैंने पैदल चलना शुरू कर दिया | चलते चलते मुझे खुद पर गुस्सा आने लगा था की क्यों मैंने एक रूपया खर्च कर दिया |

अर्जी देने के बाद मैं बाहर निकला और सामने की चाय की दूकान पर जा कर बैठ गया | नीम के पेड़ के नीचे चाय की दुकान धुप में बहुत अच्छी लग रही थी | मैंने दुकान वाले को एक चाय देने को बोला और पास में पड़ा अखबार हाथ में ले कर देखने लगा | थोड़ी देर बाद वहां पर एक मजदूर औरत बीडी खरीदने आयी, उसने दो बीडी खरीदी, एक को उसने कान के पीछे फंसा लिया और दूसरी को दूकान के स्टोव से जलाने की कोशिश करने लगी | उसके साथ एक चार-पांच साल का बच्चा भी था जो इतनी देर से मुझे देख रहा था और जब मैंने उसे देखा तो उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया और दूकान में देखने लगा | स्टोव के पास में कुछ कांच के बर्तन रखे थे जिन में अलग अलग रंग और आकार के बिस्कुट रखे थे और अब वो बच्चे की नज़र में आ चुके थे | उसने अपने माँ का हाथ हिलाकर ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश करी मगर वो तो बीडी को जलाने के लिए पूरी की पूरी स्टोव में घुसी जा रही थी | तीन-चार बार कोशिश करने के बाद अपनी माँ की तरफ से कोई उत्तर न मिलने की वजह से उसके चेहरे पर रोने के भाव झलकने लगे थे | वो पूरी तरह से रोना शुरू करता उस से पहले मैंने बर्तन में से दो अलग अलग रंग के बिस्कुट निकाल कर उसके आगे कर दिए. बच्चा थोडा झिझका मगर उसने बिना कुछ बोले मेरे हाथ से बिस्कुट ले लिए | बीडी का धुंआ छोड़ते हुए उसकी माँ ने बोला "बिगड़ जाएगा साहब", सुन कर मैंने उसे देखा, उसके भाव मुझे खुश होने वाले तो नहीं लग रहे थे | मैंने मन में सोचा की उसे बोलू की जो तुम कर रही हो उस से तुम्हारा बच्चा बहुत सुधर रहा है, मगर ऐसा उसके मुँह पर बोलने की न मेरी हिम्मत थी न मेरे लिए बड़े शोभा की बात थी इस्सलिये बिना कुछ बोले मैं वापस अपनी जगह बैठ गया |

मैंने चलते चलते सोचा की लिफ्ट ही ले लूं तो भी बड़े आराम से घर के आस पास तक पहुँच जाऊंगा | पीछे मुड़ कर देखा, एक पतला दुबला सा आदमी धीरे धीरे सायकल चला कर आ रहा था और दूर दूर तक सड़क पर कुछ नहीं था | उस से लिफ्ट लेता तो थोडा आगे जा के मुझे ही सायकल चलानी पड़ती जो की आगे जा के अच्छा निर्णय साबित हुआ होता मगर मैंने उसे भी जाने दिया | धुप से खुद को थोडा थोडा बचाते हुए मैं चलता जा रहा था | चलते चलते मुझे ऐसा लगा की पीछे से कोई पुरानी सी डीज़ल से चलने वाली गाड़ी आ रही है, मैंने पीछे मुड़ कर देखा, एक सामान लाने ले जाने वाला एक टेम्पो आ रहा है मगर दूर से ही समझ आ रहा था की वो भी लोगों से भरा हुआ है | मैंने वापस आगे मुँह कर के चलना शुरू कर दिया | टेम्पो की आवाज़ तेज होती जा रही थी फिर धीरे से वो मुझे सड़क पर पीछे करता हुआ आगे निकाल गया | मैंने इतनी देर से नीचे देखते हुआ चल रहा था, टेम्पो को देखने के लिए मैंने ऊपर देखा तो टेम्पो में सब से पीछे वोही बच्चा अपनी माँ की गोदी में बैठा बिस्कुट खा रहा था | उसने मुझे देखा और मुस्कुराते हुआ बाकी बचा बिस्कुट भी मुँह में रख लिया | मैंने भी मुस्कुरा के उस का उत्तर दिया | अब मैं खुश था और धुप भी कम होने लगी थी |