अब मेरे पास जेब में केवल तीन रुपये बचे थे और जहाँ मैं खड़ा था वहां से घर की तरफ जाने वाली बस में कम से कम चार रुपये का टिकट आता था | आज पता नहीं कैसे हो गया कि घर से निकलते समय मैं अपने बटुए में पैसे रखना भूल गया | बस में बैठने के बाद याद तो आया था, मगर सोचा की कोई बात बात नहीं वापस बस से आने का किराया तो है ही |
शहर के टेलीफोन विभाग का मुख्य कार्यालय थोडा शहर के बाहर की तरफ था | वहां पर घर का टेलीफोन बदलवाने के लिए अर्जी देनी थी और पिताजी ने दफ्तर जाने के पहले बोला था कि ये काम आज के आज हो जाना चाहिए | सुबह से आलस करते करते आधा दिन निकल चूका था फिर आखिरकार माँ की डांट सुनने के बाद मुझे निकलना ही पड़ा था |
धुप काफी तेज थी और मैं सड़क के किनारे खड़ा था, सोच रहा था की बस में चढ़ तो जाता हूँ और कंडक्टर को बोलूँगा की जहाँ तक तीन रुपये में छोड़ सकता है छोड़ दे मगर कंडक्टर नहीं माना तो फ़ालतू में बेईज्ज़ती हो जाएगी और बस से उतार और देगा, उसके ऊपर से अगर बस में कोई मोहल्लेवाला होगा तो पूरे मोहल्ले में बात फ़ैल जायेगी, सारे दोस्त हँसेंगे | वहां से अब मेरे पास पैदल जाने के अलावा कोई और उपाय नहीं था, मैंने पैदल चलना शुरू कर दिया | चलते चलते मुझे खुद पर गुस्सा आने लगा था की क्यों मैंने एक रूपया खर्च कर दिया |
अर्जी देने के बाद मैं बाहर निकला और सामने की चाय की दूकान पर जा कर बैठ गया | नीम के पेड़ के नीचे चाय की दुकान धुप में बहुत अच्छी लग रही थी | मैंने दुकान वाले को एक चाय देने को बोला और पास में पड़ा अखबार हाथ में ले कर देखने लगा | थोड़ी देर बाद वहां पर एक मजदूर औरत बीडी खरीदने आयी, उसने दो बीडी खरीदी, एक को उसने कान के पीछे फंसा लिया और दूसरी को दूकान के स्टोव से जलाने की कोशिश करने लगी | उसके साथ एक चार-पांच साल का बच्चा भी था जो इतनी देर से मुझे देख रहा था और जब मैंने उसे देखा तो उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया और दूकान में देखने लगा | स्टोव के पास में कुछ कांच के बर्तन रखे थे जिन में अलग अलग रंग और आकार के बिस्कुट रखे थे और अब वो बच्चे की नज़र में आ चुके थे | उसने अपने माँ का हाथ हिलाकर ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश करी मगर वो तो बीडी को जलाने के लिए पूरी की पूरी स्टोव में घुसी जा रही थी | तीन-चार बार कोशिश करने के बाद अपनी माँ की तरफ से कोई उत्तर न मिलने की वजह से उसके चेहरे पर रोने के भाव झलकने लगे थे | वो पूरी तरह से रोना शुरू करता उस से पहले मैंने बर्तन में से दो अलग अलग रंग के बिस्कुट निकाल कर उसके आगे कर दिए. बच्चा थोडा झिझका मगर उसने बिना कुछ बोले मेरे हाथ से बिस्कुट ले लिए | बीडी का धुंआ छोड़ते हुए उसकी माँ ने बोला "बिगड़ जाएगा साहब", सुन कर मैंने उसे देखा, उसके भाव मुझे खुश होने वाले तो नहीं लग रहे थे | मैंने मन में सोचा की उसे बोलू की जो तुम कर रही हो उस से तुम्हारा बच्चा बहुत सुधर रहा है, मगर ऐसा उसके मुँह पर बोलने की न मेरी हिम्मत थी न मेरे लिए बड़े शोभा की बात थी इस्सलिये बिना कुछ बोले मैं वापस अपनी जगह बैठ गया |
मैंने चलते चलते सोचा की लिफ्ट ही ले लूं तो भी बड़े आराम से घर के आस पास तक पहुँच जाऊंगा | पीछे मुड़ कर देखा, एक पतला दुबला सा आदमी धीरे धीरे सायकल चला कर आ रहा था और दूर दूर तक सड़क पर कुछ नहीं था | उस से लिफ्ट लेता तो थोडा आगे जा के मुझे ही सायकल चलानी पड़ती जो की आगे जा के अच्छा निर्णय साबित हुआ होता मगर मैंने उसे भी जाने दिया | धुप से खुद को थोडा थोडा बचाते हुए मैं चलता जा रहा था | चलते चलते मुझे ऐसा लगा की पीछे से कोई पुरानी सी डीज़ल से चलने वाली गाड़ी आ रही है, मैंने पीछे मुड़ कर देखा, एक सामान लाने ले जाने वाला एक टेम्पो आ रहा है मगर दूर से ही समझ आ रहा था की वो भी लोगों से भरा हुआ है | मैंने वापस आगे मुँह कर के चलना शुरू कर दिया | टेम्पो की आवाज़ तेज होती जा रही थी फिर धीरे से वो मुझे सड़क पर पीछे करता हुआ आगे निकाल गया | मैंने इतनी देर से नीचे देखते हुआ चल रहा था, टेम्पो को देखने के लिए मैंने ऊपर देखा तो टेम्पो में सब से पीछे वोही बच्चा अपनी माँ की गोदी में बैठा बिस्कुट खा रहा था | उसने मुझे देखा और मुस्कुराते हुआ बाकी बचा बिस्कुट भी मुँह में रख लिया | मैंने भी मुस्कुरा के उस का उत्तर दिया | अब मैं खुश था और धुप भी कम होने लगी थी |
शहर के टेलीफोन विभाग का मुख्य कार्यालय थोडा शहर के बाहर की तरफ था | वहां पर घर का टेलीफोन बदलवाने के लिए अर्जी देनी थी और पिताजी ने दफ्तर जाने के पहले बोला था कि ये काम आज के आज हो जाना चाहिए | सुबह से आलस करते करते आधा दिन निकल चूका था फिर आखिरकार माँ की डांट सुनने के बाद मुझे निकलना ही पड़ा था |
धुप काफी तेज थी और मैं सड़क के किनारे खड़ा था, सोच रहा था की बस में चढ़ तो जाता हूँ और कंडक्टर को बोलूँगा की जहाँ तक तीन रुपये में छोड़ सकता है छोड़ दे मगर कंडक्टर नहीं माना तो फ़ालतू में बेईज्ज़ती हो जाएगी और बस से उतार और देगा, उसके ऊपर से अगर बस में कोई मोहल्लेवाला होगा तो पूरे मोहल्ले में बात फ़ैल जायेगी, सारे दोस्त हँसेंगे | वहां से अब मेरे पास पैदल जाने के अलावा कोई और उपाय नहीं था, मैंने पैदल चलना शुरू कर दिया | चलते चलते मुझे खुद पर गुस्सा आने लगा था की क्यों मैंने एक रूपया खर्च कर दिया |
अर्जी देने के बाद मैं बाहर निकला और सामने की चाय की दूकान पर जा कर बैठ गया | नीम के पेड़ के नीचे चाय की दुकान धुप में बहुत अच्छी लग रही थी | मैंने दुकान वाले को एक चाय देने को बोला और पास में पड़ा अखबार हाथ में ले कर देखने लगा | थोड़ी देर बाद वहां पर एक मजदूर औरत बीडी खरीदने आयी, उसने दो बीडी खरीदी, एक को उसने कान के पीछे फंसा लिया और दूसरी को दूकान के स्टोव से जलाने की कोशिश करने लगी | उसके साथ एक चार-पांच साल का बच्चा भी था जो इतनी देर से मुझे देख रहा था और जब मैंने उसे देखा तो उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया और दूकान में देखने लगा | स्टोव के पास में कुछ कांच के बर्तन रखे थे जिन में अलग अलग रंग और आकार के बिस्कुट रखे थे और अब वो बच्चे की नज़र में आ चुके थे | उसने अपने माँ का हाथ हिलाकर ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश करी मगर वो तो बीडी को जलाने के लिए पूरी की पूरी स्टोव में घुसी जा रही थी | तीन-चार बार कोशिश करने के बाद अपनी माँ की तरफ से कोई उत्तर न मिलने की वजह से उसके चेहरे पर रोने के भाव झलकने लगे थे | वो पूरी तरह से रोना शुरू करता उस से पहले मैंने बर्तन में से दो अलग अलग रंग के बिस्कुट निकाल कर उसके आगे कर दिए. बच्चा थोडा झिझका मगर उसने बिना कुछ बोले मेरे हाथ से बिस्कुट ले लिए | बीडी का धुंआ छोड़ते हुए उसकी माँ ने बोला "बिगड़ जाएगा साहब", सुन कर मैंने उसे देखा, उसके भाव मुझे खुश होने वाले तो नहीं लग रहे थे | मैंने मन में सोचा की उसे बोलू की जो तुम कर रही हो उस से तुम्हारा बच्चा बहुत सुधर रहा है, मगर ऐसा उसके मुँह पर बोलने की न मेरी हिम्मत थी न मेरे लिए बड़े शोभा की बात थी इस्सलिये बिना कुछ बोले मैं वापस अपनी जगह बैठ गया |
मैंने चलते चलते सोचा की लिफ्ट ही ले लूं तो भी बड़े आराम से घर के आस पास तक पहुँच जाऊंगा | पीछे मुड़ कर देखा, एक पतला दुबला सा आदमी धीरे धीरे सायकल चला कर आ रहा था और दूर दूर तक सड़क पर कुछ नहीं था | उस से लिफ्ट लेता तो थोडा आगे जा के मुझे ही सायकल चलानी पड़ती जो की आगे जा के अच्छा निर्णय साबित हुआ होता मगर मैंने उसे भी जाने दिया | धुप से खुद को थोडा थोडा बचाते हुए मैं चलता जा रहा था | चलते चलते मुझे ऐसा लगा की पीछे से कोई पुरानी सी डीज़ल से चलने वाली गाड़ी आ रही है, मैंने पीछे मुड़ कर देखा, एक सामान लाने ले जाने वाला एक टेम्पो आ रहा है मगर दूर से ही समझ आ रहा था की वो भी लोगों से भरा हुआ है | मैंने वापस आगे मुँह कर के चलना शुरू कर दिया | टेम्पो की आवाज़ तेज होती जा रही थी फिर धीरे से वो मुझे सड़क पर पीछे करता हुआ आगे निकाल गया | मैंने इतनी देर से नीचे देखते हुआ चल रहा था, टेम्पो को देखने के लिए मैंने ऊपर देखा तो टेम्पो में सब से पीछे वोही बच्चा अपनी माँ की गोदी में बैठा बिस्कुट खा रहा था | उसने मुझे देखा और मुस्कुराते हुआ बाकी बचा बिस्कुट भी मुँह में रख लिया | मैंने भी मुस्कुरा के उस का उत्तर दिया | अब मैं खुश था और धुप भी कम होने लगी थी |
awesome short story ... very well indeed
ReplyDeleteshabaash ladke :)
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